झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmibai)
1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी", वीरांगना
एक नज़र में मुख्य तथ्य (Quick Facts)
अनमोल विचार एवं प्रसिद्ध कथन
"मैं अपनी झाँसी किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी!"
— झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmibai)"हम अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं, और यदि युद्ध भूमि में वीरगति प्राप्त होती है तो मोक्ष निश्चित है।"
— झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmibai)रानी लक्ष्मीबाई ने गर्जना करते हुए कहा—'मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी!' 1857 के गदर में उन्होंने झाँसी की सेना का नेतृत्व किया, अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर दोनों हाथों में तलवार लिए ब्रिटिश सेना से भीषण युद्ध लड़ा। 18 जून 1858 को ग्वालियर के कोटा की सराय में लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने उनकी अमर गाथा लिखी: 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी'।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmibai) - सामान्य ज्ञान क्विज़ (Quiz)
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1 रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम क्या था?
अन्य महापुरुषों का जीवन परिचय
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