प्रेरणादायक जीवन कहानियाँ
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पत्थर तराशने वाले की सीख (The Master Sculptor)
प्रेरणा मंच
साहित्यिक कृति
कहानी सुनें (Audio Story)
AI वॉइस
सुनने के लिए प्ले बटन दबाएं (हिंदी वाचन)
एक प्रसिद्ध मूर्तिकार एक भव्य मंदिर के लिए भगवान की मूर्ति बनाने हेतु जंगल से दो बड़े और सुंदर पत्थर चुनकर लाया।
उसने अपने औज़ार निकाले और पहले पत्थर पर अपनी हथौड़ी और छेनी से पहली चोट की। चोट पड़ते ही पत्थर में से दर्द भरी आवाज़ आई—'अरे मूर्तिकार! रुक जाओ, मुझे बहुत तेज़ दर्द हो रहा है। मुझ पर दया करो और मुझे छोड़ दो।'
मूर्तिकार दयालु था। उसने उस पत्थर को एक ओर रख दिया और दूसरे पत्थर को तराशना प्रारंभ किया। दूसरे पत्थर पर जब हथौड़ी और छेनी की सैकड़ों चोटें पड़ीं, तो उसने उफ़ तक नहीं की और चुपचाप सारी पीड़ा सहन करता रहा। कुछ ही दिनों में मूर्तिकार की कला और पत्थर के धैर्य से एक अत्यंत मनमोहक, दिव्य और तेजस्वी प्रतिमा तैयार हो गई।
गाँव के लोग मूर्ति लेने पहुँचे। जब वे मूर्ति ले जाने लगे, तो उन्होंने देखा कि एक और पत्थर खाली पड़ा है। उन्होंने सोचा कि यह पत्थर मंदिर के प्रवेश द्वार पर नारियल फोड़ने और सीढ़ी बनाने के काम आएगा। वे दोनों पत्थर साथ ले गए।
मंदिर में भव्य प्रतिष्ठा हुई। दूसरे पत्थर से बनी मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया गया, जहाँ लोग चंदन, धूप, दीप और पुष्पों से उसकी पूजा करते, आरती उतारते और शीश नवाते।
जबकि पहले पत्थर को, जिसने दर्द सहने से इनकार कर दिया था, मंदिर की सीढ़ी के पास रख दिया गया। अब रोज़ उस पर लोग पैर रखकर गुजरते और उस पर जोर-जोर से नारियल फोड़ते।
एक रात पहले पत्थर ने रोते हुए गर्भगृह की पूज्य मूर्ति से कहा—'भाई! तुम भी उसी जंगल के पत्थर हो और मैं भी। परंतु तुम्हारा यह आदर और मुझ पर रोज़ की यह मार क्यों?'
मूर्ति ने मुस्कुराते हुए बड़े प्रेम से उत्तर दिया—'मित्र! जब मूर्तिकार तुम्हें रूप दे रहा था, यदि तुमने उस दिन छेनी-हथौड़ी की चंद चोटें सहन कर ली होतीं, तो आज मेरी जगह तुम पूजे जाते। तुमने उस दिन की अस्थायी पीड़ा से बचने का प्रयास किया, इसलिए तुम्हें आज जीवन भर की चोटें सहनी पड़ रही हैं।'
पहला पत्थर अपनी भूल समझ गया, परंतु अब पछताने से क्या लाभ था।
उसने अपने औज़ार निकाले और पहले पत्थर पर अपनी हथौड़ी और छेनी से पहली चोट की। चोट पड़ते ही पत्थर में से दर्द भरी आवाज़ आई—'अरे मूर्तिकार! रुक जाओ, मुझे बहुत तेज़ दर्द हो रहा है। मुझ पर दया करो और मुझे छोड़ दो।'
मूर्तिकार दयालु था। उसने उस पत्थर को एक ओर रख दिया और दूसरे पत्थर को तराशना प्रारंभ किया। दूसरे पत्थर पर जब हथौड़ी और छेनी की सैकड़ों चोटें पड़ीं, तो उसने उफ़ तक नहीं की और चुपचाप सारी पीड़ा सहन करता रहा। कुछ ही दिनों में मूर्तिकार की कला और पत्थर के धैर्य से एक अत्यंत मनमोहक, दिव्य और तेजस्वी प्रतिमा तैयार हो गई।
गाँव के लोग मूर्ति लेने पहुँचे। जब वे मूर्ति ले जाने लगे, तो उन्होंने देखा कि एक और पत्थर खाली पड़ा है। उन्होंने सोचा कि यह पत्थर मंदिर के प्रवेश द्वार पर नारियल फोड़ने और सीढ़ी बनाने के काम आएगा। वे दोनों पत्थर साथ ले गए।
मंदिर में भव्य प्रतिष्ठा हुई। दूसरे पत्थर से बनी मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया गया, जहाँ लोग चंदन, धूप, दीप और पुष्पों से उसकी पूजा करते, आरती उतारते और शीश नवाते।
जबकि पहले पत्थर को, जिसने दर्द सहने से इनकार कर दिया था, मंदिर की सीढ़ी के पास रख दिया गया। अब रोज़ उस पर लोग पैर रखकर गुजरते और उस पर जोर-जोर से नारियल फोड़ते।
एक रात पहले पत्थर ने रोते हुए गर्भगृह की पूज्य मूर्ति से कहा—'भाई! तुम भी उसी जंगल के पत्थर हो और मैं भी। परंतु तुम्हारा यह आदर और मुझ पर रोज़ की यह मार क्यों?'
मूर्ति ने मुस्कुराते हुए बड़े प्रेम से उत्तर दिया—'मित्र! जब मूर्तिकार तुम्हें रूप दे रहा था, यदि तुमने उस दिन छेनी-हथौड़ी की चंद चोटें सहन कर ली होतीं, तो आज मेरी जगह तुम पूजे जाते। तुमने उस दिन की अस्थायी पीड़ा से बचने का प्रयास किया, इसलिए तुम्हें आज जीवन भर की चोटें सहनी पड़ रही हैं।'
पहला पत्थर अपनी भूल समझ गया, परंतु अब पछताने से क्या लाभ था।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
कठिनाइयां और संघर्ष ही हमारे व्यक्तित्व को निखारते हैं। जो संघर्ष से डरकर टूट जाते हैं, वे सीढ़ी का पत्थर बनकर रह जाते हैं।