पंचतंत्र की नीति कथाएँ
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शेर और चतुर खरगोश (The Lion and the Clever Hare)
विष्णु शर्मा (पंचतंत्र)
साहित्यिक कृति
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एक घने जंगल में भासुरक नाम का एक अत्यंत पराक्रमी और क्रूर शेर रहता था। वह प्रतिदिन अपनी भूख से कहीं अधिक वन्य पशुओं का वध कर डालता था। जंगल के सभी जानवर हिरण, जंगली सूअर, खरगोश और नीलगाय भयभीत रहने लगे।
एक दिन जंगल के समस्त प्रमुख पशुओं ने एकत्र होकर एक सभा की। उन्होंने शेर के पास जाकर विनम्र निवेदन किया—'हे महाराज! आप हमारे स्वामी हैं। अकारण इतने पशुओं का संहार करने से वन शीघ्र ही शून्य हो जाएगा। हम प्रतिज्ञा करते हैं कि आपकी सेवा में प्रतिदिन स्वेच्छा से एक पशु भोजन के रूप में उपस्थित हो जाएगा। इससे आपकी भूख भी शांत होगी और हम भी निर्भय होकर रह सकेंगे।'
शेर ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। प्रतिदिन क्रम से एक-एक पशु शेर की गुफा में जाने लगा। एक दिन एक छोटे खरगोश की बारी आई।
खरगोश बहुत बुद्धिमान था। उसने विचार किया—'मृत्यु तो निश्चित ही है, तो क्यों न कोई ऐसी युक्ति निकाली जाए जिससे मेरी जान भी बचे और इस दुष्ट शेर से संपूर्ण जंगल को मुक्ति भी मिल जाए।'
वह मार्ग में जानबूझकर अत्यंत धीमी गति से चलने लगा। रास्ते में उसे एक गहरा और पुराना कुआँ दिखाई दिया, जिसमें निर्मल जल भरा था और झाँकने पर स्पष्ट परछाईं दिखती थी। खरगोश की आँखों में चमक आ गई।
जब खरगोश शेर के पास पहुँचा, तो सूर्यास्त हो चुका था। भूख और प्यास से व्याकुल शेर क्रोध से आगबबूला हो रहा था। उसने दहाड़कर पूछा—'एक तो तू इतना छोटा है कि मेरी दाढ़ भी नहीं भरेगी, ऊपर से इतनी देर से आया है! मैं अभी तुझे मारकर कल से जंगल के सारे जानवरों का नाश कर दूँगा।'
खरगोश ने हाथ जोड़कर अत्यंत नम्रता से कहा—'महाराज! इसमें न मेरा दोष है और न जंगल के पशुओं का। आपके भोजन के लिए पाँच खरगोश भेजे गए थे। परंतु मार्ग में एक अन्य महाबली शेर ने हमें रोक लिया और कहा कि वह इस जंगल का असली राजा है और आपको ढोंगी बताया। उसने मेरे चार साथियों को खा लिया और मुझे आपको यह चेतावनी देने भेजा है।'
भासुरक शेर क्रोध से तिलमिला उठा। उसने गरजते हुए कहा—'इस जंगल में मेरे अलावा दूसरा कौन राजा पैदा हो गया? मुझे तुरंत उसके पास ले चल, मैं उसका वध करूँगा।'
चतुर खरगोश शेर को उसी गहरे कुएँ के पास ले गया और बोला—'महाराज! वह दुष्ट अपने किले (दुर्ग) के अंदर छिपा हुआ है।'
शेर ने जब कुएँ के अंदर झाँका, तो उसे शांत जल में अपना ही प्रतिबिंब दिखाई दिया। उसने समझा कि सचमुच दूसरा शेर नीचे बैठा उसे घूर रहा है। शेर ने क्रोध में भयंकर दहाड़ मारी। कुएँ से दोगुनी गूँज के साथ प्रतिध्वनि लौटी। मूर्ख भासुरक ने समझा कि दूसरा शेर उसे ललकार रहा है। वह आव देखा न ताव, तुरंत कुएँ के भीतर कूद पड़ा। गहरे पानी में डूबकर और पत्थरों से टकराकर दुष्ट शेर का अंत हो गया।
खरगोश ने जंगल में लौटकर सभी जानवरों को यह शुभ समाचार सुनाया। सभी ने खरगोश की बुद्धिमानी की प्रशंसा की और जंगल में पुनः शांति व उल्लास छा गया।
एक दिन जंगल के समस्त प्रमुख पशुओं ने एकत्र होकर एक सभा की। उन्होंने शेर के पास जाकर विनम्र निवेदन किया—'हे महाराज! आप हमारे स्वामी हैं। अकारण इतने पशुओं का संहार करने से वन शीघ्र ही शून्य हो जाएगा। हम प्रतिज्ञा करते हैं कि आपकी सेवा में प्रतिदिन स्वेच्छा से एक पशु भोजन के रूप में उपस्थित हो जाएगा। इससे आपकी भूख भी शांत होगी और हम भी निर्भय होकर रह सकेंगे।'
शेर ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। प्रतिदिन क्रम से एक-एक पशु शेर की गुफा में जाने लगा। एक दिन एक छोटे खरगोश की बारी आई।
खरगोश बहुत बुद्धिमान था। उसने विचार किया—'मृत्यु तो निश्चित ही है, तो क्यों न कोई ऐसी युक्ति निकाली जाए जिससे मेरी जान भी बचे और इस दुष्ट शेर से संपूर्ण जंगल को मुक्ति भी मिल जाए।'
वह मार्ग में जानबूझकर अत्यंत धीमी गति से चलने लगा। रास्ते में उसे एक गहरा और पुराना कुआँ दिखाई दिया, जिसमें निर्मल जल भरा था और झाँकने पर स्पष्ट परछाईं दिखती थी। खरगोश की आँखों में चमक आ गई।
जब खरगोश शेर के पास पहुँचा, तो सूर्यास्त हो चुका था। भूख और प्यास से व्याकुल शेर क्रोध से आगबबूला हो रहा था। उसने दहाड़कर पूछा—'एक तो तू इतना छोटा है कि मेरी दाढ़ भी नहीं भरेगी, ऊपर से इतनी देर से आया है! मैं अभी तुझे मारकर कल से जंगल के सारे जानवरों का नाश कर दूँगा।'
खरगोश ने हाथ जोड़कर अत्यंत नम्रता से कहा—'महाराज! इसमें न मेरा दोष है और न जंगल के पशुओं का। आपके भोजन के लिए पाँच खरगोश भेजे गए थे। परंतु मार्ग में एक अन्य महाबली शेर ने हमें रोक लिया और कहा कि वह इस जंगल का असली राजा है और आपको ढोंगी बताया। उसने मेरे चार साथियों को खा लिया और मुझे आपको यह चेतावनी देने भेजा है।'
भासुरक शेर क्रोध से तिलमिला उठा। उसने गरजते हुए कहा—'इस जंगल में मेरे अलावा दूसरा कौन राजा पैदा हो गया? मुझे तुरंत उसके पास ले चल, मैं उसका वध करूँगा।'
चतुर खरगोश शेर को उसी गहरे कुएँ के पास ले गया और बोला—'महाराज! वह दुष्ट अपने किले (दुर्ग) के अंदर छिपा हुआ है।'
शेर ने जब कुएँ के अंदर झाँका, तो उसे शांत जल में अपना ही प्रतिबिंब दिखाई दिया। उसने समझा कि सचमुच दूसरा शेर नीचे बैठा उसे घूर रहा है। शेर ने क्रोध में भयंकर दहाड़ मारी। कुएँ से दोगुनी गूँज के साथ प्रतिध्वनि लौटी। मूर्ख भासुरक ने समझा कि दूसरा शेर उसे ललकार रहा है। वह आव देखा न ताव, तुरंत कुएँ के भीतर कूद पड़ा। गहरे पानी में डूबकर और पत्थरों से टकराकर दुष्ट शेर का अंत हो गया।
खरगोश ने जंगल में लौटकर सभी जानवरों को यह शुभ समाचार सुनाया। सभी ने खरगोश की बुद्धिमानी की प्रशंसा की और जंगल में पुनः शांति व उल्लास छा गया।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
बुद्धि जिसके पास है, बल भी उसी का है। बिना सोचे-समझे किए गए क्रोध और अहंकार का अंत विनाशकारी होता है।