मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानियाँ
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दो बैलों की कथा (Do Bailon Ki Katha)
मुंशी प्रेमचंद
साहित्यिक कृति
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AI वॉइस
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जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को परले दरजे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है 'बैल'।
झूरी काछी के दोनों बैलों के नाम थे—हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे—देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक-दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते।
एक बार झूरी ने दोनों बैलों को अपने ससुराल (गया के घर) भेज दिया। बैलों को क्या मालूम वे क्यों भेजे जा रहे हैं! समझे, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने; पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं (जोड़ी) ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता, तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते; पगहिया पकड़कर आगे से खींचता, तो दोनों पीछे को जोर लगाते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते—'तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी।'
रात को जब दोनों नए स्थान पर पहुँचे, तो उन्होंने कुछ न खाया। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। रात को दोनों ने सलाह की और पगहे तुड़ाकर झूरी के घर की तरफ भाग निकले। सवेरे जब झूरी सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं। दोनों के गलों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया और दौड़कर उन्हें गले लगा लिया।
लेकिन अगले ही दिन गया फिर आया और दोनों बैलों को ले गया। इस बार उसने उन्हें मोटी रस्सियों से बाँधा और सूखा भूसा खाने को दिया। गया के घर में एक नन्ही लड़की रहती थी, जो भैरो की बेटी थी। उसकी माँ मर चुकी थी और सौतेली माँ उसे मारती थी। इसलिए उस अनाथ लड़की को इन मूक जीवों से गहरा लगाव हो गया था। वह रोज़ रात को चुपके से दोनों को दो रोटियाँ खिला जाती थी। उस एक रोटी से उनकी भूख तो क्या शांत होती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल जाता था।
एक दिन उस बालिका ने दोनों के गले की रस्सी खोल दी। दोनों सरपट भागे। गया ने पीछा किया, पर पकड़ न सका। रास्ते में दोनों रास्ता भटक गए और एक मटर के खेत में चरने लगे। तभी कांजीहौस के रखवालों ने उन्हें घेर लिया और पकड़कर कांजीहौस में बंद कर दिया।
कांजीहौस में हीरा और मोती ने देखा कि वहाँ कई घोड़े, बकरियाँ और गधे भूखे-प्यासे मुर्दों की तरह पड़े हैं। मोती ने रात को अपने सींगों से कच्ची दीवार तोड़ना शुरू किया। आधी दीवार गिरते ही घोड़ी, बकरियाँ और गधे भाग निकले। हीरा की रस्सी मजबूत थी, वह भाग न सका। मोती चाहता तो भाग सकता था, पर उसने अपने साथी हीरा को अकेला छोड़कर भागने से इनकार कर दिया।
सवेरे मुंशी और कर्मचारियों ने देखा तो मोती की खूब पिटाई की और उसे मोटी जंजीर से बाँध दिया। एक हफ्ते तक दोनों को केवल पानी दिया गया। दोनों कंकाल बन गए। अंत में उन्हें एक कसाई के हाथ नीलाम कर दिया गया।
कसाई उन्हें हाँकते हुए ले जा रहा था। दोनों मौत के डर से काँप रहे थे। अचानक उन्हें लगा कि यह रास्ता जाना-पहचाना है। हाँ, वही खेत, वही कुआँ! उनका गाँव पास आ गया था। दोनों में न जाने कहाँ से असीम शक्ति आ गई। दोनों कसाई का हाथ छुड़ाकर अपने पुराने घर की ओर दौड़े और सीधे झूरी के थान पर जाकर खड़े हो गए।
झूरी ने उन्हें देखा तो खुशी के आँसू छलक पड़े। कसाई बैलों को पकड़ने आया, तो मोती ने सींग उठाए और उसे गाँव से बाहर खदेड़ दिया। गाँव के सब लोग यह देखकर तालियाँ बजाने लगे। मालकिन ने भी आकर दोनों बैलों के माथे चूम लिए।
झूरी काछी के दोनों बैलों के नाम थे—हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे—देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक-दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते।
एक बार झूरी ने दोनों बैलों को अपने ससुराल (गया के घर) भेज दिया। बैलों को क्या मालूम वे क्यों भेजे जा रहे हैं! समझे, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने; पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं (जोड़ी) ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता, तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते; पगहिया पकड़कर आगे से खींचता, तो दोनों पीछे को जोर लगाते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते—'तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी।'
रात को जब दोनों नए स्थान पर पहुँचे, तो उन्होंने कुछ न खाया। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। रात को दोनों ने सलाह की और पगहे तुड़ाकर झूरी के घर की तरफ भाग निकले। सवेरे जब झूरी सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं। दोनों के गलों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया और दौड़कर उन्हें गले लगा लिया।
लेकिन अगले ही दिन गया फिर आया और दोनों बैलों को ले गया। इस बार उसने उन्हें मोटी रस्सियों से बाँधा और सूखा भूसा खाने को दिया। गया के घर में एक नन्ही लड़की रहती थी, जो भैरो की बेटी थी। उसकी माँ मर चुकी थी और सौतेली माँ उसे मारती थी। इसलिए उस अनाथ लड़की को इन मूक जीवों से गहरा लगाव हो गया था। वह रोज़ रात को चुपके से दोनों को दो रोटियाँ खिला जाती थी। उस एक रोटी से उनकी भूख तो क्या शांत होती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल जाता था।
एक दिन उस बालिका ने दोनों के गले की रस्सी खोल दी। दोनों सरपट भागे। गया ने पीछा किया, पर पकड़ न सका। रास्ते में दोनों रास्ता भटक गए और एक मटर के खेत में चरने लगे। तभी कांजीहौस के रखवालों ने उन्हें घेर लिया और पकड़कर कांजीहौस में बंद कर दिया।
कांजीहौस में हीरा और मोती ने देखा कि वहाँ कई घोड़े, बकरियाँ और गधे भूखे-प्यासे मुर्दों की तरह पड़े हैं। मोती ने रात को अपने सींगों से कच्ची दीवार तोड़ना शुरू किया। आधी दीवार गिरते ही घोड़ी, बकरियाँ और गधे भाग निकले। हीरा की रस्सी मजबूत थी, वह भाग न सका। मोती चाहता तो भाग सकता था, पर उसने अपने साथी हीरा को अकेला छोड़कर भागने से इनकार कर दिया।
सवेरे मुंशी और कर्मचारियों ने देखा तो मोती की खूब पिटाई की और उसे मोटी जंजीर से बाँध दिया। एक हफ्ते तक दोनों को केवल पानी दिया गया। दोनों कंकाल बन गए। अंत में उन्हें एक कसाई के हाथ नीलाम कर दिया गया।
कसाई उन्हें हाँकते हुए ले जा रहा था। दोनों मौत के डर से काँप रहे थे। अचानक उन्हें लगा कि यह रास्ता जाना-पहचाना है। हाँ, वही खेत, वही कुआँ! उनका गाँव पास आ गया था। दोनों में न जाने कहाँ से असीम शक्ति आ गई। दोनों कसाई का हाथ छुड़ाकर अपने पुराने घर की ओर दौड़े और सीधे झूरी के थान पर जाकर खड़े हो गए।
झूरी ने उन्हें देखा तो खुशी के आँसू छलक पड़े। कसाई बैलों को पकड़ने आया, तो मोती ने सींग उठाए और उसे गाँव से बाहर खदेड़ दिया। गाँव के सब लोग यह देखकर तालियाँ बजाने लगे। मालकिन ने भी आकर दोनों बैलों के माथे चूम लिए।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती, उसके लिए निरंतर संघर्ष और स्वाभिमान की आवश्यकता होती है। पशुओं में भी मूक संवेदना और भाईचारा होता है।
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