मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानियाँ
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ईदगाह (Idgah)
मुंशी प्रेमचंद
साहित्यिक कृति
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रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद आज ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है! वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है! मेले जाने की तैयारियाँ हो रही हैं।
लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक; किसी ने वह भी नहीं; लेकिन मेले जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम रटते थे; आज वह आ गई।
इन सबमें सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पाँच साल का गरीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया था और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रुपए कमाने गए हैं, बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएँगे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं। इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज़ है और फिर बच्चों की आशा!
गाँव से मेला चला। बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब के सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतज़ार करते। शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। सहसा ईदगाह नज़र आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजिम बिछी हुई है। नमाज़ियों की कतारें एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गई हैं। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं।
नमाज़ खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौनों की दुकानों पर धावा होता है। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया, महमूद सिपाही लेता है, नूरे को वकील से प्रेम है। सब दो-दो पैसों के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, वह इतने कीमती खिलौने कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए।
खिलौनों के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ लीं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहनहलवा। सब मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है।
मिठाइयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की थीं। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं। हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह यह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। खिलौनों से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं।
हामिद ने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—यह तुम्हारे काम का नहीं है जी!
'बिकाऊ है कि नहीं?'
'बिकाऊ क्यों नहीं है। छह पैसे लगेंगे।'
हामिद का दिल बैठ गया। कलेजा मजबूत करके बोला—तीन पैसे लोगे?
और वह आगे बढ़ गया कि कहीं दुकानदार घुड़की न दे। लेकिन दुकानदार ने घुड़की नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक हो और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया।
गाँव पहुँचकर बच्चों ने अपने-अपने खिलौने दिखाए। मोहसिन की बहन ने भिश्ती को गोद में लिया और नाचने लगी, तो वह गिरकर टूट गया। महमूद का सिपाही भी एक दुर्घटना में शहीद हो गया।
अब सुनिए हामिद का हाल। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
'यह चिमटा कहाँ था?'
'मैंने मोल लिया है।'
'के पैसे में?'
'तीन पैसे दिए।'
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया, लाया क्या—चिमटा!
'सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?'
हामिद ने अपराधी भाव से कहा—'तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे ले लिया।'
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया। और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बूढ़ी दादी की याद बनी रही।
अमीना का मन गद्गद हो गया। और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद इस चिमटे के सामने एक छोटा-सा बच्चा था, और आज अमीना बालिका बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसुओं की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!
लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक; किसी ने वह भी नहीं; लेकिन मेले जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम रटते थे; आज वह आ गई।
इन सबमें सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पाँच साल का गरीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया था और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रुपए कमाने गए हैं, बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएँगे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं। इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज़ है और फिर बच्चों की आशा!
गाँव से मेला चला। बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब के सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतज़ार करते। शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। सहसा ईदगाह नज़र आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजिम बिछी हुई है। नमाज़ियों की कतारें एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गई हैं। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं।
नमाज़ खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौनों की दुकानों पर धावा होता है। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया, महमूद सिपाही लेता है, नूरे को वकील से प्रेम है। सब दो-दो पैसों के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, वह इतने कीमती खिलौने कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए।
खिलौनों के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ लीं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहनहलवा। सब मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है।
मिठाइयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की थीं। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं। हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह यह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। खिलौनों से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं।
हामिद ने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—यह तुम्हारे काम का नहीं है जी!
'बिकाऊ है कि नहीं?'
'बिकाऊ क्यों नहीं है। छह पैसे लगेंगे।'
हामिद का दिल बैठ गया। कलेजा मजबूत करके बोला—तीन पैसे लोगे?
और वह आगे बढ़ गया कि कहीं दुकानदार घुड़की न दे। लेकिन दुकानदार ने घुड़की नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक हो और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया।
गाँव पहुँचकर बच्चों ने अपने-अपने खिलौने दिखाए। मोहसिन की बहन ने भिश्ती को गोद में लिया और नाचने लगी, तो वह गिरकर टूट गया। महमूद का सिपाही भी एक दुर्घटना में शहीद हो गया।
अब सुनिए हामिद का हाल। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
'यह चिमटा कहाँ था?'
'मैंने मोल लिया है।'
'के पैसे में?'
'तीन पैसे दिए।'
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया, लाया क्या—चिमटा!
'सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?'
हामिद ने अपराधी भाव से कहा—'तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे ले लिया।'
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया। और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बूढ़ी दादी की याद बनी रही।
अमीना का मन गद्गद हो गया। और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद इस चिमटे के सामने एक छोटा-सा बच्चा था, और आज अमीना बालिका बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसुओं की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!
कहानी की सीख (Moral of the Story)
सच्चा प्यार और संवेदना भौतिक सुखों और खिलौनों से कहीं बढ़कर होती है। बड़ों का दर्द समझना ही सबसे बड़ी परिपक्वता है।
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