मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानियाँ
8 मिनट का पठन
5 बार पढ़ा गया
पंच परमेश्वर (Panch Parmeshwar)
मुंशी प्रेमचंद
साहित्यिक कृति
कहानी सुनें (Audio Story)
AI वॉइस
सुनने के लिए प्ले बटन दबाएं (हिंदी वाचन)
जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गए थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गए थे, और अलगू जब कभी बाहर जाते, तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खान-पान का व्यवहार था, न धर्म का नाता; केवल विचार मिलते थे, मित्रता का मूलमंत्र यही है।
जुम्मन शेख की एक बूढ़ी खाला (मौसी) थीं। उनके पास कुछ थोड़ी-सी मिल्कियत थी; परंतु उनके निकट संबंधियों में कोई न था। जुम्मन ने लंबे-चौड़े वादे करके वह मिल्कियत अपने नाम लिखवा ली थी। जब तक दानपत्र की रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का खूब आदर-सत्कार किया गया। उन्हें खूब स्वादिष्ट भोजन खिलाए गए। पर रजिस्ट्री की मुहर लगते ही इस खातिरदारी पर भी मुहर लग गई। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के तीखे तीर भी देने लगीं।
कुछ दिन खालाजान ने सुना और सहा; पर जब न सहा गया, तब उन्होंने जुम्मन से शिकायत की। जुम्मन ने गृहस्वामिनी के प्रबंध में दखल देना उचित न समझा। कुछ दिन इसी तरह और बीते। अंत में खाला ने जुम्मन से कहा—'बेटा! तुम्हारे साथ मेरा निबाह न होगा। तुम मुझे रुपए दे दिया करो, मैं अपना अलग पका-खा लूँगी।'
जुम्मन ने धृष्टता के साथ उत्तर दिया—'रुपए क्या यहाँ फलते हैं?'
खाला ने बिगड़कर कहा—'तो मुझे रूखा-सूखा भी न मिलेगा?'
जुम्मन ने गंभीर स्वर में जवाब दिया—'तो मैंने यह तो न समझा था कि तुम अमर होकर आई हो।'
खाला ने गाँव के भले आदमियों के पास अपनी फरियाद सुनाई। अंत में वह अलगू चौधरी के पास पहुँची। अलगू ने कहा—'मौसी, जुम्मन मेरे पुराने दोस्त हैं, मैं उनसे बिगाड़ नहीं कर सकता।'
खाला ने कहा—'बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?'
यह बात अलगू के दिल में गड़ गई।
एक दिन संध्या समय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले से ही पूरा प्रबंध कर रखा था। पंचों ने कहा—'जुम्मन मियाँ! पंच जिसे चुन लो, वही सरपंच होगा।'
जुम्मन ने कहा—'खालाजान जिसे चाहें, चुन लें।'
खाला ने ऊँचे स्वर में कहा—'अरे लोगो! खुदा से डरो। पंच न किसी के दोस्त होते हैं, न किसी के दुश्मन। अगर किसी पर तुम्हारा विश्वास न हो, तो जाने दो, अलगू चौधरी को तो मानते हो? लो, मैं उन्हीं को सरपंच मानती हूँ।'
अलगू चौधरी सरपंच बने। उन्होंने जुम्मन से सवाल-जवाब शुरू किए। जुम्मन मन ही मन खुश थे कि अलगू तो मेरा दोस्त है, फैसला मेरे हक में ही होगा। लेकिन अलगू जब पंच के आसन पर बैठे, तो उनके अंदर जिम्मेदारी और निष्पक्षता की भावना जाग उठी।
अलगू ने फैसला सुनाया—'जुम्मन शेख! पंचों ने इस मामले पर विचार किया। उन्हें यही उचित जान पड़ता है कि खालाजान को माहवार खर्च दिया जाए। यदि तुम्हें खर्च देना मंजूर न हो, तो रजिस्ट्री रद्द समझी जाए।'
यह फैसला सुनते ही जुम्मन सन्न रह गए। मित्रों की बातचीत बंद हो गई। वे एक-दूसरे को शत्रु समझने लगे। जुम्मन बदले का अवसर ढूँढने लगे।
कुछ समय बाद ऐसा मौका भी आया। अलगू चौधरी ने एक खूबसूरत बैल बटेशर के मेले से खरीदा था। दैवयोग से वह बैल मर गया, तो दूसरा बैल उन्होंने समझू साहू को उधार बेचा। शर्त थी कि एक महीने में दाम चुका देंगे। समझू साहू ने बैल से बेतहाशा काम लिया, न दाना दिया न पानी। कुछ ही दिनों में बैल मर गया। अब साहू जी दाम देने से मुकरने लगे।
मामला फिर पंचायत में गया। इस बार समझू साहू ने सरपंच के रूप में जुम्मन शेख का नाम प्रस्तावित किया। अलगू का कलेजा धड़कने लगा। उन्होंने सोचा, अब जुम्मन मुझसे पुराना बदला लेगा।
लेकिन जब जुम्मन शेख सरपंच के उच्च आसन पर बैठे, तो उनके मन में अपनी पदवी की गरिमा का भान हुआ। उन्होंने सोचा—'मैं इस वक्त न्याय के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ। मेरे मुँह से जो निकलेगा, वह खुदा का हुक्म होगा। मुझे अपने व्यक्तिगत द्वेष को सत्य से तनिक भी डिगने नहीं देना चाहिए।'
दोनों पक्षों से गवाहियाँ ली गईं। अंत में जुम्मन ने फैसला सुनाया—'अलगू चौधरी और समझू साहू! पंचों ने तुम्हारे मामले पर भली-भाँति विचार किया। समझू के लिए उचित है कि वह बैल का पूरा दाम चुकाए। जिस वक्त बैल बेचा गया था, उसे कोई बीमारी न थी। यदि समझू ने उसी समय दाम दे दिए होते, तो आज यह नौबत न आती। बैल की मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे बड़ा कठिन परिश्रम लिया गया और उसके दाने-चारे का कोई प्रबंध न किया गया।'
यह फैसला सुनते ही अलगू चौधरी खुशी से झूम उठे और खड़े होकर बोले—'पंच परमेश्वर की जय!' चारों ओर से ध्वनि गूँज उठी—'पंच परमेश्वर की जय!'
थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आए और उनके गले लिपट गए। जुम्मन ने रोते हुए कहा—'भैया! जब से तुमने मेरी खाला का फैसला किया, मैं तुम्हारा शत्रु बन गया था। पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठकर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे कुछ नहीं सूझता।' अलगू भी रोने लगे। दोनों के आंसुओं ने उनके दिलों का मैल धो डाला।
जुम्मन शेख की एक बूढ़ी खाला (मौसी) थीं। उनके पास कुछ थोड़ी-सी मिल्कियत थी; परंतु उनके निकट संबंधियों में कोई न था। जुम्मन ने लंबे-चौड़े वादे करके वह मिल्कियत अपने नाम लिखवा ली थी। जब तक दानपत्र की रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का खूब आदर-सत्कार किया गया। उन्हें खूब स्वादिष्ट भोजन खिलाए गए। पर रजिस्ट्री की मुहर लगते ही इस खातिरदारी पर भी मुहर लग गई। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के तीखे तीर भी देने लगीं।
कुछ दिन खालाजान ने सुना और सहा; पर जब न सहा गया, तब उन्होंने जुम्मन से शिकायत की। जुम्मन ने गृहस्वामिनी के प्रबंध में दखल देना उचित न समझा। कुछ दिन इसी तरह और बीते। अंत में खाला ने जुम्मन से कहा—'बेटा! तुम्हारे साथ मेरा निबाह न होगा। तुम मुझे रुपए दे दिया करो, मैं अपना अलग पका-खा लूँगी।'
जुम्मन ने धृष्टता के साथ उत्तर दिया—'रुपए क्या यहाँ फलते हैं?'
खाला ने बिगड़कर कहा—'तो मुझे रूखा-सूखा भी न मिलेगा?'
जुम्मन ने गंभीर स्वर में जवाब दिया—'तो मैंने यह तो न समझा था कि तुम अमर होकर आई हो।'
खाला ने गाँव के भले आदमियों के पास अपनी फरियाद सुनाई। अंत में वह अलगू चौधरी के पास पहुँची। अलगू ने कहा—'मौसी, जुम्मन मेरे पुराने दोस्त हैं, मैं उनसे बिगाड़ नहीं कर सकता।'
खाला ने कहा—'बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?'
यह बात अलगू के दिल में गड़ गई।
एक दिन संध्या समय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले से ही पूरा प्रबंध कर रखा था। पंचों ने कहा—'जुम्मन मियाँ! पंच जिसे चुन लो, वही सरपंच होगा।'
जुम्मन ने कहा—'खालाजान जिसे चाहें, चुन लें।'
खाला ने ऊँचे स्वर में कहा—'अरे लोगो! खुदा से डरो। पंच न किसी के दोस्त होते हैं, न किसी के दुश्मन। अगर किसी पर तुम्हारा विश्वास न हो, तो जाने दो, अलगू चौधरी को तो मानते हो? लो, मैं उन्हीं को सरपंच मानती हूँ।'
अलगू चौधरी सरपंच बने। उन्होंने जुम्मन से सवाल-जवाब शुरू किए। जुम्मन मन ही मन खुश थे कि अलगू तो मेरा दोस्त है, फैसला मेरे हक में ही होगा। लेकिन अलगू जब पंच के आसन पर बैठे, तो उनके अंदर जिम्मेदारी और निष्पक्षता की भावना जाग उठी।
अलगू ने फैसला सुनाया—'जुम्मन शेख! पंचों ने इस मामले पर विचार किया। उन्हें यही उचित जान पड़ता है कि खालाजान को माहवार खर्च दिया जाए। यदि तुम्हें खर्च देना मंजूर न हो, तो रजिस्ट्री रद्द समझी जाए।'
यह फैसला सुनते ही जुम्मन सन्न रह गए। मित्रों की बातचीत बंद हो गई। वे एक-दूसरे को शत्रु समझने लगे। जुम्मन बदले का अवसर ढूँढने लगे।
कुछ समय बाद ऐसा मौका भी आया। अलगू चौधरी ने एक खूबसूरत बैल बटेशर के मेले से खरीदा था। दैवयोग से वह बैल मर गया, तो दूसरा बैल उन्होंने समझू साहू को उधार बेचा। शर्त थी कि एक महीने में दाम चुका देंगे। समझू साहू ने बैल से बेतहाशा काम लिया, न दाना दिया न पानी। कुछ ही दिनों में बैल मर गया। अब साहू जी दाम देने से मुकरने लगे।
मामला फिर पंचायत में गया। इस बार समझू साहू ने सरपंच के रूप में जुम्मन शेख का नाम प्रस्तावित किया। अलगू का कलेजा धड़कने लगा। उन्होंने सोचा, अब जुम्मन मुझसे पुराना बदला लेगा।
लेकिन जब जुम्मन शेख सरपंच के उच्च आसन पर बैठे, तो उनके मन में अपनी पदवी की गरिमा का भान हुआ। उन्होंने सोचा—'मैं इस वक्त न्याय के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ। मेरे मुँह से जो निकलेगा, वह खुदा का हुक्म होगा। मुझे अपने व्यक्तिगत द्वेष को सत्य से तनिक भी डिगने नहीं देना चाहिए।'
दोनों पक्षों से गवाहियाँ ली गईं। अंत में जुम्मन ने फैसला सुनाया—'अलगू चौधरी और समझू साहू! पंचों ने तुम्हारे मामले पर भली-भाँति विचार किया। समझू के लिए उचित है कि वह बैल का पूरा दाम चुकाए। जिस वक्त बैल बेचा गया था, उसे कोई बीमारी न थी। यदि समझू ने उसी समय दाम दे दिए होते, तो आज यह नौबत न आती। बैल की मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे बड़ा कठिन परिश्रम लिया गया और उसके दाने-चारे का कोई प्रबंध न किया गया।'
यह फैसला सुनते ही अलगू चौधरी खुशी से झूम उठे और खड़े होकर बोले—'पंच परमेश्वर की जय!' चारों ओर से ध्वनि गूँज उठी—'पंच परमेश्वर की जय!'
थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आए और उनके गले लिपट गए। जुम्मन ने रोते हुए कहा—'भैया! जब से तुमने मेरी खाला का फैसला किया, मैं तुम्हारा शत्रु बन गया था। पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठकर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे कुछ नहीं सूझता।' अलगू भी रोने लगे। दोनों के आंसुओं ने उनके दिलों का मैल धो डाला।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
पंच के आसन पर बैठकर मनुष्य निष्पक्ष हो जाता है। न्याय के सामने न कोई मित्र होता है और न कोई शत्रु।
अन्य लोकप्रिय कहानियाँ
ईदगाह (Idgah)
मासूम हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना के असीम प्रेम और त्याग की दिल छू लेने वाली कालजयी कहानी।
कहानी पढ़ें →दो बैलों की कथा (Do Bailon Ki Katha)
हीरा और मोती दो स्वाभिमानी बैलों की अद्भुत दास्तान, जो आजादी और वफादारी का अमर संदेश देती है।
कहानी पढ़ें →